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Tuesday, March 5, 2024

ड्रैगन फ्रूट की खेती कैसे करें? यहां जानें | Dragon Fruit Farming In Hindi

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ड्रैगन फ्रूट (Dragon fruit) काफी समय से चर्चा में है। भारत में इसके खेती बहुत ही कम समय में लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। जैसा कि ड्रैगन फ्रूट के नाम से पता चल रहा है कि यह विदेशी फल है। यह फल रसीला और औषधीय गुणों से भरपूर है।

ड्रैगन फ्रूट किसानों को ज्यादा मुनाफा देने वाली नकदी फसल है। भारत के कई राज्यों के प्रगतिशील किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती (dragon fruit ki kheti) करना शुरू कर चुके हैं। लेकिन बहुत ही कम किसानों को इसकी खेती के बारे में जानकारी है।

तो आइए, इस ब्लॉग में ड्रैगन फ्रूट की खेती (dragon fruit farming in hindi) को विस्तार से जानें।

ड्रैगन फ्रूट एक रसीला, मीठा फल है, दिखने में यह गुलाबी होती है लेकिन इसके किस्म के आधार पर और भी रंग की होती है। ड्रैगन फ्रूट का वैज्ञानिक नाम हिलोकेरेस अंडटस और हिन्दी नाम पिताया या स्ट्रॉबेरी पीयर है। इसका पौधा नागफनी पौधे की तरह का होता है। बाजार में यह फल 600 से 800 रुपए प्रतिकिलो की दर से बिकता है।

बता दें ड्रैगन फ्रूट थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में बहुत ही लोकप्रिय है। वहां इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। वहां के मार्केट में किसान इसे अच्छे दामों में बेच कर लाखों कमाते हैं।

इस फल की मांग और भाव के कारण भारत के किसान भी इसे व्यवसाय के रूप मे अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे है। ड्रैगन फ्रूट से जैम, आइसक्रीम, जेली, जूस और वाइन बनाई जाती है। ड्रैगन फ्रूट के खाने से मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित किया जा सकता हैं। इसके फल में बीज किवी की तरह काफी अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

आइए अब ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए आवश्यक जलवायु के बारे में जान लेते हैं।

ड्रैगन फ्रूट के लिए उपयुक्त जलवायु

ड्रैगन फ्रूट (Dragon fruit) नम और गर्म जलवायु का पौधा है। भारत में इसकी आसानी से की जा सकती है। इसकी खेती ज्यादा बर्फबारी वाले इलाके में नहीं की जा सकती है। तापमान की बात करें तो अधिकतम 40 डिग्री सेन्टीग्रेड और न्यूनतम 10 डिग्री सेल्सियस तक इस पौधे के लिए लाभप्रद होता है।

ड्रैगन फ्रूट के लिए आवश्यक मिट्टी

ड्रैगन फ्रूट की खेती (Dragon fruit cultivation) में लगभग 7-8 PH मान वाली मिट्टी मे इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। इसके लिए सभी प्रकार की उपजाऊ मिट्टी अनुकूल है। जलजमाव वाले इलाके में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए। इसकी खेती जहां भी करें जलनिकासी अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।

ड्रैगन फ्रूट

ड्रैगन फ्रूट की खेती का तरीका

भारत में यह फल नया है, अतः किसानों को इसकी खेती की पूरी जानकारी होनी चाहिए। ड्रैगन फ्रूट के पौधे बीज और पौध दोनों प्रकार से इसकी खेती की जाती है। इसके पौधों को पौध(कलम) के से लगाना बेहतर होता है। कलम के रूप में लगाने पर पौधा 2 साल बाद पैदावार देना शुरू कर देता है। जबकि बीज से लगाने यह समय 4-5 साल लग जाते हैं। जब भी कलम या बीज खरीदें, प्रमाणित या विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें। सदैव इन्हें किसी रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीदें।

इस फल की खेती करने में ज्यादा पानी की अवश्यकता नहीं होती है। कम पानी में भी ड्रैगन फ्रूट की खेती आसानी से कर सकते हैं। सर्दियों के मौसम में इसके पौधे को महीने में दो बार सिंचाई की जरूरत होती है जबकि गर्मियों में 8-12 दिन में सिंचाई की जरूरत होती है।

उर्वरक और खाद की बात करें तो ड्रैगन फ्रूट की खेती (dragon fruit ki kheti) के लिए जैविक खाद सबसे अच्छा होता है। इसमें 10 से 15 किलो गोबर की खाद और 50 से 70 ग्राम एन.पी.के. की मात्रा को मिट्टी में मिलाकर पौधे की रोपाई से पहले तैयार किए गए गड्डों में भर कर सिंचाई करें।

ड्रैगन फ्रूट की किस्में

ड्रैगन फ्रूट की मुख्यतः 3 किस्में हैं।

  • सफेद गूदा वाला, गुलाबी रंग का फल
  • लाल गूदा वाला, गुलाबी रंग का फल
  • सफेद गूदा वाला पीले रंग का फल

ड्रैगन फ्रूट की खेती में लागत और कमाई

कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि इस ड्रैगन की फसल में केवल एक बार पूंजी लगाने की आवश्यकता होती है। पारंपरिक खेती के मुकाबले इससे 25 वर्षों तक आमदनी ले सकते हैं। लागत की बात करें तो इसके पौधे कैक्टस की तरह होता है। इसके फलन के लिए पौधों को सहारे की जरुरत पड़ती है। इसके स्ट्रेक्चर को खड़़ा करने के लिए प्रति एकड़ ढ़ाई से तीन लाख रुपए खर्च होते हैं। एक एकड़ में 10 फीट की दूरी पर खंभा खड़ा कर उसके सहारे पौध लगाए जाते हैं। प्रति एकड़ करीब 17 सौ पौधे की आवश्यकता होती है। एक बार मोटी रकम खर्च के बाद उसी स्ट्रेक्चर पर यह 25 वर्षो तक उपज देता है।

ये तो थी ड्रैगन फ्रूट की खेती (dragon fruit farming) की बात। लेकिन, The Rural India पर आपको कृषि, मशीनीकरण, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इस लेख को शेयर सकते हैं।

Resource: https://www.theruralindia.in/2021/05/blog-post_11.html

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